Thursday, January 30, 2020
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छत्रपति शिवाजी महाराज का पत्र मिर्ज़ा राजा जयसिंह के नाम

Letter of Chhatrapati Shivaji Maharaj to Mirza Raja Jaysingh

आज ही के दिन अर्थात 6 जून, 1674 ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी को छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक हुआ था। इसी दिन शिवाजी ने महाराष्ट्र में हिंदू राज्य की स्थापना की थी।

छत्रपति शिवाजी महाराज का पत्र मिर्ज़ा राजा जयसिंह के नाम
6 जून विशेष, प्रस्तुति – ‘अवत्सार’


ऐ सरदारों के सरदार, राजाओं के राजा, (तथा) भारतोद्यान की क्यारियों के व्यवस्थापक! ऐ रामचन्द्र के चैतन्य हृदयांश, तुझसे राजपूतों की ग्रीवा उन्नत है। तुझसे बाबर वंश की राज्यलक्ष्मी अधिक प्रबल हो रही है, (तथा) शुभ भाग्य, से तुझ से सहायता (मिलती) है। ऐ जवान (प्रबल) भाग्य (तथा) वृद्ध (प्रौढ़) बुद्धि वाले जयशाह! सेवा (शिवा) का प्रणाम तथा आशीष स्वीकार कर। जगत का जनक तेरा रक्षक हो, (तथा) तुझको धर्म एवं न्याय का मार्ग दिखाये।


मैंने सुना है कि तू मुझ पर आक्रमण करने (एवं) दक्षिण – प्रान्त को विजय करने आया है। हिन्दुओं के हृदय तथा आँखों के रक्त से तू संसार में लाल मुँह वाला (यशस्वी) हुआ चाहता है। पर तू यह नहीं जानता कि यह (तेरे मुँह पर) कालिख लग रही है क्योंकि इससे देश तथा धर्म को आपत्ति हो रही है। यदि तू क्षणमात्र गिरेबान में सिर डाले (विचार करे) और यदि तू अपने हाथ और दामन पर (विवेक) दृष्टि करे, तो तू देखेगा कि यह रंग किसके खून का है और इस रंग का (वास्तविक) रंग दोनों लोक में क्या है (लाल या काला)। यदि तू अपनी ओर से स्वयं दक्षिण – विजय करने आता (तो) मेरे सिर और आँख तेरे रास्ते के बिछौने बन जाते। मैं तेरे हमरकाब (घोड़े के साथ) बड़ी सेना लेकर चलता (और) एक सिरे से दूसरे सिरे तक (भूमि) तुझे सौंप देता (विजयी कर देता)। पर तू तो औरंगजेब की ओर से (उस) भद्रजनों के धोखा देने वाले के बहकावे में पड़ कर आया है। अब मैं नहीं जानता कि तेरे साथ कौन खेल खेलूं? (अब) यदि मैं तुझ से मिल जाँऊ तो यह पुरुषत्व नहीं है, क्योंकि पुरुष लोग समय की सेवा नहीं करते, सिंह लोमड़ीपना नहीं करते। और यदि मैं तलवार तथा कुठार से काम लेता हूँ तो दोनों ओर हिन्दुओं को ही हानि पहुँचती है।


बड़ा खेद तो यह है कि मुसलमानों का खून पीने के अतिरिक्त किसी अन्य कार्य के निमित्त मेरी तलवार को म्यान से निकलना पड़े। यदि इस लड़ाई के लिये तुर्क आये होते तो (हम) शेर – मद के निमित्त (घर बैठे) शिकार आये होते। पर वह न्याय तथा धर्म से वंचित पापी जोकि मनुष्य के रूप में राक्षस है, जब अफजलखां से कोई श्रेष्ठता न प्रगट हुई (और) न शाइस्ताखां की कोई योग्यता देखी तो तुझको हमारे युद्ध के निमित्त नियत करता है। क्योंकि वह स्वयं तो हमारे आक्रमण को सहने की योग्यता रखता नहीं। वह चाहता है कि हिन्दुओं के दल में कोई बलशाली संसार में न रह जाए, सिंहगण आपस में ही (लड़ भिड़ कर) घायल तथा श्रांत हो जाएं जिससे कि गीदड़ जंगल के सिंह बन बैठे। यह गुप्तभेद तेरे सिर में क्यों नहीं बैठता?


प्रतीत होता है कि उसका जादू तुझे बहकाये रहता है। तूने संसार में बहुत भला बुरा देखा है। उद्यान से तूने फूल और काँटे दोनों ही संचित किये हैं। यह नहीं चाहिये कि तू हम लोगों से युद्ध करे (और) हिन्दुओं के सिरों को धूल में मिलावे। ऐसी परिपक्व कर्मण्यता (प्राप्त होने) पर भी जवानी (यौवनोचित कार्य) मत कर। प्रत्युत सादी के इस कथन को स्मरण कर “ सब स्थानों पर घोड़ा नहीं दौड़ाया जाता। कहीं – कहीं ढाल भी फेंक कर भागना उचित होता है।” व्याघ्र मृग आदि पर व्याघ्रता करते हैं सिंहों के साथ गृह – युद्ध में प्रवृत्त नहीं होते। यदि तेरी काटने वाली तलवार में पानी है, यदि तेरे कूदने वाले घोड़े में दम है तो तुझ को चाहिये कि धर्म के शत्रु पर आक्रमण करे (एवं) इस्लाम की जड़ – मूल खोद डाले। अगर देश का राजा दाराशिकोह होता तो हम लोगों के साथ भी कृपा तथा अनुग्रह के बर्ताव होते। पर तूने जसवन्तसिंह को धोखा दिया (तथा) हृदय में ऊंचनीच नहीं सोचा। तू लोमड़ी का खेल खेलकर अभी अघाया नहीं है, (और) सिंहों से युद्ध के निमित्त ढिठाई करके आया है। तुझको इस दौड़ धूप से क्या मिलता है, तेरी तृष्णा मुझे मृगतृष्णा दिखलाती है। तू उस तुच्छ व्यक्ति के सदृश है जो कि बहुत श्रम करता है और किसी सुन्दरी को अपने हाथ में लाता है, पर उसकी सौंदर्य – वाटिका का फल स्वयं नहीं खाता, प्रत्युत उसको प्रतिद्वन्दियों के हाथ में सौंप देता है।


तू उस नीच की कृपा पर क्या अभिमान करता है? तू जुझारसिंह के काम का परिणाम जानता है। तू जानता है कि कमार छत्रसाल पर वह किस प्रकार से आपत्ति पहुचाना चाहता था। तू जानता है कि दूसरे हिन्दुओं पर भी उस दुष्ट के हाथ से क्या – क्या विपत्तियां नहीं आई। मैंने माना कि तूने उससे सम्बन्ध जोड़ लिया है और कुल की मर्यादा उसके सिर तोड़ी है (पर) उस राक्षस के निमित्त इस बन्धन का जाल क्या वस्तु है क्योंकि वह बन्धन तो इजारबन्द से अधिक दृढ़ नहीं है। वह तो अपने इष्ट साधन के लिए भाई के रक्त (तथा) बाप ‘ के प्राणों से भी नहीं डरता। यदि तू राजभक्ति की दुहाई दे तो तू यह तो स्मरण कर कि तूने शाहजहां के साथ क्या बर्ताव किया।


यदि तुझको विधाता के यहाँ से बुद्धि का कुछ भाग मिला है, (और) तू पौरुष तथा पुरुषत्व की बड़ाई मारता है तो तू अपनी जन्म – भूमि के संताप से तलवार को तपा (लथा) अत्याचार से दुखियों के आँसू से (उस पर) पानी दे। यह अवसर हम लोगों के आपस में लड़ने का नहीं है क्योंकि हिन्दुओं पर (इस समय) बड़ा कठिन कार्य पड़ा है। हमारे लड़के बाले, देश, धन, देव – देवालय तथा पवित्र देवपूजक इन सब पर उसके काम से आपत्ति पड़ रही है, (तथा) उनका दु:ख सीमा तक पहुँच गया है। यदि कुछ दिन उसका काम ऐसा ही चलता रहा (तो) हम लोगों का कोई चिन्ह (भी) पृथ्वी पर न रह जायेगा।


बड़े आश्चर्य की बात है कि मुट्ठी भर मुसलमान हमारे (इतने) बड़े इस देश पर प्रभुता जमावें। यह प्रबलता (कुछ) पुरुषार्थ के कारण नहीं है। यदि तुझको समझ की आंख हैं तो देख (कि) वह हमारे साथ कैसी धोखे की चालें चलता है, और अपने मुँह पर कैसा – कैसा रंग रंगता है। हमारे पाँवों को हमारी ही सांकलों से जकड़ता है (तथा) हमारे सिरों को हमारी ही तलवारों से काटता है। हम लोगों को (इस समय) हिन्दू, हिन्दुस्थान तथा हिन्दू – धर्म (की रक्षा) के निमित्त अत्यधिक प्रयत्न करना चाहिये। हमको चाहिये कि हम यत्न करें और कोई राय स्थिर करें (तथा) अपने देश के लिये खूब हाथ पाँव मारें। तलवार पर और तदबीर पर पानी दें (अर्थात् उन्हें चमकावें) और तुकों का जवाब तुर्की में (जैसे को तैसा) दें। यदि तू जसवन्तसिंह से मिल जाय और हृदय से उस कपट कलेवर के खंड पड़ जाए (तथा) राणा से भी तू एकता का व्यवहार कर ले तो आशा है कि बड़ा काम निकल जाये। चारों तरफ से धावा करके तुम लोग युद्ध करो। उस सांप के सिर को पत्थर के नीचे दबा लो (कुचल डालो) कि कुछ दिनों तक वह अपने ही परिणाम की सोच में पड़ा रहे (और) दक्षिण – प्रांत की ओर अपना जाल न फैलावे (और) मैं इस ओर भाला चलाने वाले वीरों के साथ इन दोनों बादशाहों का भेजा निकाल डालूं। मेघों की भांति गरजने वाली सेना से मुसलमानों पर तलवार का पानी बरसाऊं। दक्षिण देश के पटल पर से एक सिरे से दूसरे तक इस्लाम का नाम तथा चिन्ह धो डालूं। इसके पश्चात् कार्यदक्ष शूरों तथा भाला चलाने वाले वीरों के साथ लहरें लेती हुई तथा कोलाहल मचाती हुई नदी की भांति दक्षिण के पहाड़ों से निकल कर मैदान में आऊं और अत्यन्त शीघ्र तुम लोगों की सेवा में उपस्थित होऊं और फिर तुम लोगों को हिसाब पूछू, फिर हम लोग चारों ओर से घोर युद्ध उपस्थित कर और लड़ाई का मैदान उसके निमित्त संकीर्ण कर दें। हम लोग अपनी सेनाओं की तरंगों को दिल्ली में उस जर्जरीभूत घर में पहुंचा दें। उसके नाम में न तो औरंग (राजसिंहासन) और न जेब (शोभा) न उसकी अत्याचारी तलवार (रह जाय) और न कपट का जाल।


हम लोग शुद्ध रक्त से भरी हुई एक नदी बहा दें (और उससे) अपने पितरों की आत्माओं का तर्पण करें। न्यायपरायण प्राणों के उत्पन्न करने वाले (ईश्वर) की सहायता से हम लोग उसका स्थान पृथ्वी के नीचे (कब्र में) बना दें। यह काम (कुछ) बहुत कठिन नहीं है। (केवल यथोचित) हृदय, हाथ तथा आंख की आवश्यकता है। दो हृदय (यदि) एक हो जायें तो पहाड़ को तोड़ सकते हैं। (तथा) समूह के समूह को तितर बितर कर सकते हैं। इस विषय में मुझको तुझ से बहुत कुछ कहना (सुनना) है, जिसको पत्र में लाना (लिखना) (युक्ति) सम्मत नहीं है। मैं चाहता हूं कि हम लोग परस्पर बातचीत कर लें जिससे कि व्यर्थ में दु : ख और श्रम ना मिले। यदि तू चाहे तो मैं तुझ से साक्षात् बातचीत करने आऊं (और) तेरी बातों को श्रवण गोचर करूं। हम लोग बातरूपी सुन्दरी का मुख एकान्त में खोलें (और) मैं उसके बालों के उलझन पर कंघी फेरूं। यत्न के दामन पर हाथ धर उस उन्मत्त राक्षस पर कोई मन्त्र चलावें। अपने कार्य की सिद्धि की) ओर कोई रास्ता निकालें (और) दोनों, लोकों (इहलोक और परलोक) में अपना नाम ऊंचा करें।


तलवार की शपथ, घोड़े की शपथ, देश की शपथ, तथा धर्म की शपथ करता हूं कि इससे तुझ पर कदापि (कोई) आपत्ति नहीं आयेगी। अफजलखां के परिणाम से तू शंकित मत हो क्योंकि उसमें सच्चाई नहीं थी। बारह सौ बड़े लड़ाके डबशी सवार वह मेरे लिये घात में लगाये हुए था। यदि मैं पहिले ही उस पर हाथ न फेरता तो इस समय यह पत्र तुझको कौन लिखता ? (पर) मुझको तुझसे ऐसे काम की आशा नहीं है (क्योंकि) तुझको भी स्वयं मुझसे कोई शत्रुता नहीं है। यदि मैं तेरा उत्तर यथेष्ट पाऊं तो तेरे समक्ष रात्रि को अकेले आऊं। मैं तुझको वे गुप्त पत्र दिखाऊं जोकि मैंने शाइस्ताखां की जेब से निकाल लिये थे। तेरी आंखों पर मैं संशय का जल छिड़ककूं (और) तेरी सुख निद्रा को दूर करूं। तेरे स्वप्न का सच्चा – सच्चा फलादेश करूं (और) उसके पश्चात् तेरा जवाब लूं। यदि यह पत्र तेरे मन के अनुकूल न पड़े तो (फिर) मैं हूं और मेरी काटने वाली तलवार तथा तेरी सेना। कल, जिस समय सूर्य अपना मुंह सन्ध्या में छिपा लेगा उस समय मेरा अर्द्धचन्द्र (खड्ग) म्यान को फेंक देगा (म्यान से निकल आवेगा)

बस तेरा भला हो। – शिवाजी

लेखक – छत्रपति शिवाजी महाराज

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