Monday, August 19, 2019
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शहरी नक्सलवाद (बौद्धिक आतंकवाद)

बौद्धिक आतंकवाद (Intellectual terrorism) का अर्थ क्या होता है। जो हमारी मानसिकता है, जो हमारा विचार है, जो हमारी संगत है, उसे बदला जाए इसे ही हम बौद्धिक आतंकवाद कहते हैं। जैसे धर्म परिवर्तन होता है, ऐसे ही विचार परिवर्तन कैसे होता है वह बौद्धिक आतंकवाद होता है।

42वां संविधान संशोधन 1976 इंदिरा गांधी नेतीन शब्द संविधान में जोड़ें समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता और अखंडता। उस समय आपातकाल लगा था। इंदिरा गांधी की मनमानी चलती थी। तो ऐसी क्या आवश्यकता पड़ गई कि सोशलिस्ट शब्द हमारे संविधान में जोड़ना पड़ा। उस समय हमारे भारत में रूस का इतना प्रभुत्व बढ़ गया था कि हमें अपने संविधान में संशोधन करके समाजवाद का शब्द जोड़ ना पड़ा।

उस समय रूस, भारत में बहुत अंदर तक घुस चुका था। उस समय हर शहर में रूसी किताबों के बुक फेयर लगते थे सारी किताबें रशियन में आने लगी। उस समय रूस का समाजवाद हमारी संस्कृति पर इतना हावी हो चुका था।

सेकुलर शब्द इंडिया में ये हो ही नहीं सकता यह संभव ही नहीं है। हमारे यहां समाजवाद शब्द की इसलिए जरूरत नहीं थी क्योंकि हमारी विलेज इकोनामी थी। समाजवाद के बिना हम कोई काम ही नहीं करते थे, समाजवाद के बिना गांव चल ही नहीं सकता था। आज भी 21वीं सदी में देखिए पड़ोसी से साबुन, शैंपू आज भी हम मंगवा लेते हैं विश्व में और कहीं ये नहीं हो सकता। इसलिए समाजवाद शब्द की हमारे यहां जरूरत न नहीं थी। समाजवाद तो हमारे कण-कण में विद्यमान है।

धर्मनिरपेक्ष शब्दकी भी भारतमेंकोईआवश्यकतानहींथी। जैसे दूध में नींबू मिल जाने पर दूध, दूध नहीं रहता। वैसे ही धर्मनिरपेक्षता भारत में टिकही नहींसकती। धर्मनिरपेक्ष शब्द यूरोप में 2000 वर्ष पहले शुरू हुआ था। क्योंकि जो धर्म था, वह स्टेट के अंतर्गत रहता था। उस समय क्रिश्चियनिटी नई-नई शुरू हो रही थी, और वह जिस भी गांव या स्टेट में जाते थे, तो कहते थे। जो तुम्हारा धर्म है, इसके अलावा भी आपको यह धर्म मानना पड़ेगा। इसलिए वहां पर दो धर्मों को एक साथ मानने के लिए धर्मनिरपेक्ष राज्यका इस्तेमाल करा गया।

और हमारे यहां इसकीजरूरत ही नहीं थीक्योंकिहमारेयहां पीपल को, बरगद को, पत्थर को किसी भी भगवान को मानने पर कोई रोक-टोक नहीं थी। पूरी आजादी थी, कि तुम किसी भी भगवान को मानो। इसलिएहमारेयहांधर्मनिरपेक्ष शब्द की कोई आवश्यकता नहीं थी।

उसके बाद आप देखेंगे कि कैसे नियोजित तरीके से हमारे भारतीय साहित्य को नष्टऔर परिवर्तित किया गयाथा। 800 साहित्य में परिवर्तन किया था, हमारे साहित्यकारों के लेख, कहानी, कविता सबको वेस्टर्न कहानी के साथ कन्वर्ट करा। ऐसे भारत में जितने भी प्रेस थे, जैसेगीताप्रेंस सब की कमर टूट गई। जो भारत की संस्कृति का नेतृत्व कर रहे थे, उसको वेस्टर्न प्रेंसने टेकओवर कर लिया। वेद, श्रीमद्भगवद्गीता, रामायण, शिवाजी, महाराणाप्रतापयेसबलुप्तहोगए। आज हमारे भारत की विडंबना है कि चेतन भगत की बुक सबसे ज्यादा बिकती है। यह हमारे साहित्य का स्तर रहगयाहै।

भारत में गाय की बात चलती है, बीफ की बात चलती है, बीफ को खाना गर्व समझा जाता है। ऐसानहीं कि किसी और देश में किसी जानवर परप्रतिबंधनहींहै। विश्व में अनेक जानवरों पर प्रतिबंध है। क्योंकि वह उनकी अखंडताव उनकी संस्कृति का हिस्सा थे। इसलिए उसको मार कर नहीं खाते।

जैसे अमेरिका में घोड़े के मांस पर प्रतिबंध है। वहां घोड़े का मांस इसलिए लोग नहीं खाते कि वह उनकी संस्कृति का हिस्सा था। उनकी घोड़े में श्रद्धा है, उससेवह अपनी रोजी-रोटी चलाते थे, यात्राएं करते थे, जीवन की यूटिलिटी था। उस घोड़ाको इसलिए आजवहमारकरनहींखाते। इंग्लैंड में बत्तख पर प्रतिबंध है, ऑस्ट्रेलिया में कंगारू पर प्रतिबंध है। अलग-अलग देशों में अलग-अलग जानवरों पर प्रतिबंध है। उनकीमान्यताएंजुड़ीहुई है।

परंतु इस देश का दुर्भाग्य है की इस देश का 70% भौगोलिक भागगायव कृषि आधारित हो, उस पर निर्भर हो। उससे उनकी रोजी-रोटी चलती हो, इस देश में इस पर बहस चल रही है। कि यहां के लोग गाय का मांस बहुत पसंद है। भारत में आज तमाम मुस्लिम जुलाहोंके रूप में गाय की पूजा करते हैं वह उन्हें मां मानते हैं।

2014 केबादये बीफबैनकरनेकी कॉन्ट्रोवर्सी चली। इससे पहले इस ज़िक्र कहां उठता था। यह मुद्दे बनाए जाते हैं। 2014 सेपहले कौन कहता था, कि हमबीफ के बिना जिंदा नहीं रह सकते। बरखा दत्ता हर साल प्रश्न उठाती है। किआज भी भारतीय महिलाएं करवा चौथ का व्रत रखती हैं। वह सही है कि आप मॉडर्न हो गई हैं। आप को महत्व नहीं पता या बताया नहीं गया। बार-बार एक ही बात बोल कर बताना कि आप मॉडर्न है और यह प्रथा गलत है। यह बयान भारत में नई प्रथा शुरू करते हैं। भारतकानैरेटिवऐसा है कि हावर्ड में पढ़ने वाले घड़ी देखकर समय बताते हैं, और भारत के गांव का आदमी सूरज की रोशनी देखकर टाइम बता देता है।

उसके बादमीडियाकीबातकरतेहैं। मीडिया में क्या-क्याआताहैFm, hodings, movies, News etc..यह लोग समाज कानैरेटिवतयकरतेहैं। आप देखेंगे आजादी के बाद या पहले राज कपूर कीजितनीभी फिल्मेंथीं। जो लोग गरीबों पर अत्याचार करते थे जैसे जमीदार हो गए बड़े-बड़े उद्योगपति हो गए। इन सब के खिलाफ हमेशा हीरो खड़ाहोता था। हमेशा हीरो गरीबों के साथ खड़ा होता था। यह कुछ भी करते थे, पर देश के खिलाफ एक शब्द नहीं बोलते थे। उस समय फिल्मों में भी देश हित में खड़े होते थे।

देश के खिलाफ खड़ा होना या फिर देशविरोधीसुरकबआयेजबयेबौद्धिकआंतकवादआया। यहांतक 70 केदशकतकजबअमिताभ बच्चनतकसबसहीथा। जो हीरो होता था उघयोगपतियों, जमीदार के खिलाफ लड़ाई लड़ते थे। धर्मेंद्र हो, राजेश खन्ना जी, शशि कपूर हो तक। इन सब की फिल्मों में यह गरीबों के साथ खड़े नजर आए।

इनफिल्मोंमें एक पत्रकार होता था। गरीब सा, टूटी चप्पल, फटा कुर्तापहने, साइकिल सेचलाजाताथा। चैनउतरी, फिरचढ़ाई, चला जा रहा है। सत्य की खोज में भारत के मान की रक्षा के लिए, भारत के आम आदमी की जो व्यथा है। उसे बचाने के लिए वह पत्रकार तपती धूप में चलता था।

फिर 90 के दशकमें यश चोपड़ा की फिल्में “दीवार”। उससमय देशभक्ति की कितनी फिल्में दी। इनमेंमां बेटे का प्यार, मां बेटे के रिश्ते, परिवार की मर्यादा यहां तक सब ठीक था। इन सब में जो हीरो होता था वहकिसी टीचर का बेटा होता था, या किसान का बेटा होताथा। एक हिंदुस्तान केजन जनार्दनआम आदमी जमीन से जुड़ा हुआ होताथा, याअच्छी हिंदी बोलता होगा। ऐसे पात्रहोतेथे। जिसे जनता देख कर कुछ सीखती, थी। इन को अपना आदर्श मानती थी।

फिरभारतीयसिनेमाका स्वरूपबदलाशाहरुख, आमिरऔरजोनए-नएयेसबआये। ( मतलब इन का काल शुरू हुआ) अन्य जब यह लोग आए, तो दो चीजें बदली। हमारी फिल्मों सेआम आदमी गायब हो गया। जोआम आदमी था वह NRIहो गया। दूसराजो पत्रकार था, जो दिन भर तपती धूप में चलता था, वह उस NRI का दोस्त बन गया। और बांर में NRIके साथ डांस देखते हुए दिखने लगा।

फिर उस समयएक नया शब्द निकल कर आया जिसको हम दलाल कहते थे। अब वह दलाल क्या करने लगा कि वह दो देशों के बीच में या दो कंपनियों के बीच में विचौलिये बननेलगा। औरसौदाकराते समय वह अपने पास बहुत पैसा रख लेता था। उस समय दलाल वह बहुत अमीर होते गए।

हिंदुस्तान में पिछले 30 वर्षों से इंदिरा गांधी की सरकार आने के बाद हिंदुस्तान में वही लोग रहीस बने जो दलाली का काम करते थे। औरदलालीपूरीतरहसेखत्मनहींहुईहै, हमेंसरकारीदफ्तरोंमेंयेदलालआजभीमिलजाएंगे।

दलाल सबसे पैसे वाले होगयेफिर दलाली थोड़ी सस्तीपड़नेलगीथोड़ीनरम पड़ने लगी। जब बोफोर्स घोटाला हुआ, तब दलाली थी इसके बाद यह एग्जोस्टनिस्ट बन गए राजीव गांधी की सरकार के बाद मतलब गठबंधन की सरकार जिसके पास पूर्ण बहुमत नहीं होता था। उनके हाथ में सत्ता रहने लगी।

Exostnist वह लोग होते हैं जो किसी को धमका के पैसा लेना और इसमें जो सबसे आगे निकले थे। वह मीडिया वाले थे। क्योंकि हिंदुस्तान में उस समय राजीव गांधी की सरकार थी। और उस समय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया नया-नया भारत में आया था। तो इनकी रिर्पोटिंग टीवी पर देखना प्रारम्भहुआ और यह बहुतप्रचलित(हाईलाइट) हो गए। पत्रकार जो होते थे वहसमाजका आइना बन गए। सब लोगों के चहेते बन गए।

फिर देश मेंबोफोर्स घोटाला जैसे मुद्दे उभर कर आए और मीडिया वालों ने इसको बहुत कवरेज दी। सबके सामने रखा और यह बात पूरे देश में आम जन तक फैल गई। फिर इसको बंद करने के लिए सामने से पैसे का ऑफर आने लगा कि भाई पैसे लेकर इसे बंद करो धीरे-धीरे उनके मुंह पर पैसे का रंग लग गया।

आज यह हालात हो गए हैं जिसको आप मीडिया समझते हैं वह मीडिया है नहीं। वह एक वसूलीकाजरियाबनचुकाहै। और यहवसूली दो स्तर पर होती है। पहलीडायरेक्ट बिजनेस इसमें क्या होता था कि आप मुझे पैसे दो मैं उसे गाली दूंगा। दूसरा क्योंकि मैं चोर हूं तो मैं इस नेरेटिव को ही हटा देता हूं।

आज भी जो मीडिया का सामान्य पत्रकार है वहआज भी धूप में चलकर जन-जन की आवाज और जो इस देश की समस्या है। उनको लेकर मीडिया हाउस तक तोजाता है। पर होता क्या है, किजो मीडिया हाउस को चला रहे हैं। जो पत्रकार अब NRI के साथ बैठने लगे थे। वह पत्रकार उस खबर को जनता के सामने रखते ही नहीं है। चलातेही नहीं है। नेरेटिव इन लोगों ने ही तय कर रखा है।

आजशहरों मेंहमारेबीचरहकर यह शब्दावली का इस्तेमाल करते हैं जैसे ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट, उदारवादी धर्मनिरपेक्षता, सिविल सोसायटी, नर्मदा बचाओ आंदोलन, और विभिन्न तरह की NGOके रूप में यह शहरों में रहकर नक्सलवाद फैलाते हैं। औरआंदोलनकीआड़ में देशकीविकासशीलपरियोजनाओंमेंरूकावटेंपैदाकरतेहैं। ये हमसब लोगों के बीच में रहते हैं हमको इन्हें समझनाहोगा और मुंह तोड़ जवाब देने का समय आ गया है। यहभीजाननाहोगाकिकौनलोगइन्हेंसर्मथनकरतेहैं।

आजISIS, तालीबानऔरतीसरासबसेबड़ाखतराurban naxalism, intellectual terrorism, बौद्धिक आतंकवाद है। यह आज देश में बहुत विस्तृत फैले हुए हैं। नेपाल से आंध्र प्रदेश तक नक्सल बेल्टहै। इसमें 203 डिस्ट्रिक्ट, 23 राज्य व कुल देश का 40% भौगोलिकभाग नक्सल प्रभावित क्षेत्रहै। ₹11000 करोड़ इन पर खर्च होता है। और यह लोग कौन होते हैं कहां से लेते हैं यह लोग हमारे बीच में रहते हैंजैसे सिविल सोसायटी, सेकुलर, बड़ी बड़ी यूनिवर्सिटी में प्रोफेसरयह लोग इन्हें धन से सपोर्ट करते हैं दोनों का उद्देश्य यही है एक शहरों में रहकर नक्सलवाद को फैलाएगा और दूसरा जंगलों में रहकर बंदूक की नोक पर नक्सलवाद लाएगा।

इसलिए देश में नक्सल प्रभावित क्षेत्र 40% है तथा कश्मीर का क्षेत्र इस देश के कुल क्षेत्रफल कामात्र 4% है फिर भी इस देश की मीडिया हमेशा कश्मीर को ही दिखाती है उसमें दिखाती है कि सेना ने कितना अत्याचार कर रखा है आज तक इस मीडिया ने जिससे 40% हमारे देश की भौगोलिक इकाई प्रभावित है उसको मीडिया कभी तवज्जो नहीं देती। उसेकभी नहीं दिखातीकभीनहींबताती लोगों के सामने।

करगिल में इतने सैनिकशहीद नहीं हुए जितने नक्सल लोगों से लड़ने मेंशहीदहुए हैं। कश्मीर में इतने सिविलियन नहीं मरे, जितने सिविलियन लोगों को नक्सलियों ने मारा है हिंदुस्तान के मीडिया में नक्सलिज्म पर कोई खबर नहीं आती कोई पत्रकार इस को दिखाना नहीं चाहता क्यों?हाल ही में दंतेवाड़ा में दूरदर्शन के एक पत्रकार को नक्सलियों ने मार दिया था। वह पत्रकार निर्भीक होकर कैमरा चालू नहीं रखता तो शायद इस देश का मानस उससे भी वंचित रह जाता।

जिस देश नेराजनीतिकेइतनेबड़ेबड़े सिद्धांतचाणक्य, कृष्ण ने दिएहो जिनके सिद्धांत आज भी अटल हैं, आज भी अमरहैं। उस देश में माओअभीतकक्या कर रहे हैं।

बारहवीं कक्षा के बाद बच्चा निकलता है व नए परिवेश में ढलने की कोशिश करता है। जब बच्चा कॉलेज जाता है। तो उसके मां-बाप थोड़ी ना उसेबोलतेहैं, या सिखाते हैं। कि कॉलेज में जाकर भारत विरोधी नारे लगाना या फिर जेएनयू में जाकर आतंकियोंकीबरसीमनाना। उसके मां-बाप थोड़ी ना सिखा कर भेजते हैं। बच्चे जेएनयू या बड़े-बड़े कॉलेज में जाकर ही सीखता है। जैसेISIS वाले मदरसों में 8 साल के बच्चों का brainwash करके सुसाइड बौम्बरबना देते हैं।

इसी तरहहमारेविश्वविद्यालयों मेंलड़कों-लड़कियों को बौद्धिक आतंकवादीबनादेतेहैं। क्योंकि वहां से निकलने के बाद यह देश में ऐसा माहौल बनाए जहां भी वह काम करें या जहां पर भी रह रहे हो ऐसामाहौल बनाएं की देश में अराजकता फैल रही है और देश डूबा जा रहा है देश खतरे में है इसलिए नक्सलवादही सही सहारा है।

यह कैसे करते इनकी पूरी स्टेटसजी है कि लोगों को कैसे अलग करना है।

Man and womanऔरतों-आदमियों को अलग करो। हिंदुस्तान में महिलाओं को शक्ति के रूप में देखते थे ये कब से शुरू हुआ 70 तक इंदिरा को दुर्गा के रूप में बोलते थे। Co- incident है कि भारत के टीवी सीरियल्स में तब से महिलाओं को अबला नारीकेरूप दिखाया जाने लगा जबसे सोनिया गांधी ने सत्ता संभालीथी।

अब समाज कानेरिटव क्या बन गया की जो जो भी महिलाओं को अबला नारी के रूप में देखते थे। उनको प्रोत्साहन मिलने लगा। फिर इस लड़ाई ने या बहस में एक नया मोड़ ले लिया। इससे आशय यह निकल कर आया की यह तो होते ही ऐसे हैं और यह तो इसी लायक है। और महिला पुरुष का पुरुष महिला का विरोध करने लगे। और परिणाम यह निकलाकिआजजोतलाक, धारा377, धारा497 इसी का परिणाम है।

दूसरीइनकीयोजना है किहिन्दुओंकोआपसमेंबांटों-हिन्दू-मुस्लिम तो हो गयेअब हिंदुओंसे दलितों को काटो अलग करो।

नक्सलबाड़ी आंदोलन कोलकाता में चला था बंदूक की नोक पर जमींदारों से गरीबों के लिए जमीनें छीनीं जा रही थी। उस समय बंगाल में नक्सल की शुरुआत थी। उसी समय विनोबा भावे ने भूदान आंदोलन से पैदल चल कर अमीरों से जमीन दान में लेकर महाराष्ट्र में मध्यप्रदेश में 5 लाख एकड़ जमीन गरीबों में बांटे दी थी। यह दो मॉडल एक दान का, दूसरा मॉडल बंदूक चलाने वालों का था। ये भारत की पहचान का विरोध था और नया तरीका निकाला किसी काम को कराने का।

विनोदा भावे ने जिस काम को अनुरोध से करवाया उसी काम को नक्सलियों ने बंदूक से कराया। विनोदा भावे का नाम किसी नेता ने नहीं लिया किताबों में नहीं पढ़ाया जाता हमें तो बस अकबर, औरंगजेब महान था। यह पढ़ाया यही तो बौद्धिक आतंकवाद है।

अब इन से निजात कैसे पाएं। भारत सबसे बड़ीpeace keeping force है। चीन, अमेरिका, रूस, यूरोप आज भारत का लोहा मानते हैं। फिर हम इन चंद नक्सलियों से क्यों नहीं लड़ पा रहे हैं, क्यों इसको हम खत्म नहीं कर पा रहे, क्यों यह नक्सली हमारे लिए इतना बड़ा खतरा है। यहां पर सेना नहीं जा सकती या हेलीकॉप्टर नहीं जा सकता सबसे बड़ी फोर्स है वायु सेना है जलसेना है नई-नई तकनीक है फिर भी क्यों?

आज हमारे पास इतनी टेक्नोलॉजी हैकी घर में बच्चे स्विमिंग पूल में स्विमिंग कर रहे हैं या नहींयह तक हम देख सकते हैं। हमने अमेरिकी सेटेलाइटोंको काबू में कर के परमाणु परीक्षण कर लिया था। तो क्या हम आज इन नक्सलियों को नहीं देख सकते क्या?

क्यों विलपावर नहीं है, कहांसंकल्पकमजोरपड़गयेहैं, इसलिए नहीं है क्योंकि जिसके हाथ में इसको खत्म करने की जिम्मेदारी है। जिसके हाथ में इसको खत्म करने की पावर है। वह लोग इसको समर्थन करते हैं, और इसको कभी खत्म नहीं करना चाहते वह लोग कौन हैं वह हैUrbannaxals. जोप्रशासनमेंहैं, IAS, IPS , राजनेता, प्रोफेसर जो लोग सत्ता में बैठे हैं। जोलोगविश्वविद्यालयमेंबैठे हैं। यह लोग इसे खत्म नहीं करना चाहते।

आजकिसी भी प्रांत मेंIAS, IPS, प्रोफेसर जो इसको खत्म करने की कोशिश करता है। उसे उठाकर तुरंत काला पानी की सजा दे दी जाती है। उसे ऐसी जगह भेज दिया जाता है, जहां उसका अधिकार क्षेत्र खत्म, उसकी ताकत को खत्म कर दिया जाता है। और इसलिए आज जरूरत है किहम इस तंत्र में अपने आप को समाहित करें। लोगों को प्रोत्साहित करें कि वह अच्छेIAS, IPS बनकर इस तंत्र मेंजाकर अर्बन नक्सलिज्म की कमर को तोड़े। आज यदि हमारे हाथ में शक्ति होगी तो हमइस समस्या को मूल से खत्म कर सकेंगे नहीं तो यह समस्या कभी खत्म नहीं हो सकती।

यदि आज हमारे पास इन से लड़ने का सबसे बड़ा कोई हथियार है, ताकत है, इन को मारने की तो वह है इनके खिलाफ लिखनाऔर उसे प्रकाशित करना उनके शब्दावली के विरोध में अपना जवाब देना ऐसे तथ्य पेश करना जिससे यह निष्तनाभूत हो जाए।

जिस प्रकार आतंकवाद को जैसे बंदूकों से मारा जाता है उसी प्रकार इन्हें लॉजिक, नॉलेज, फैक्ट से मारना पड़ेगा। तीसरा कोई एजेंडा नहीं है केवल भारत को मजबूत बनाना है।

हमारे पास नक्सल्स से लड़ने के लिए बंदूक नहीं है पर हम इन urban naxals से तो लड़ सकते हैं। बिना uraban naxals को खत्म करें हम जंगल के Naxals को खत्म नहीं कर सकते।

माओवादी नक्सलवादी घायल कर डाली आजादी पूरा भारत आग हुआ है जलियांवाला बाग हुआ है।

Content Source: Mr. Ravi – 8130163053 judomuzyx@gmail.com https://wa.me/918130163053 https://www.instagram.com/ravijudomuzyx/ http://judomuzyx.blogspot.com https://www.facebook.com/ravijudomuzyx https://twitter.com/Ravijudomuzyx?s=08

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